गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

आ गया वसंत द्वार पर ।

आ गया वसंत द्वार पर ।

नया रक्त नयी कान्ति
नयी ऊष्मा त्यक्त भ्रान्ति
शारदा अंक में आहूत चित्त
निवेदित मन चाहे निर्भ्रान्त ज्ञान शांति।

वसंत उमंग लसित देह
वसंत संग उल्लास गेह
वसंत जीवन वसंत नेह
वसंत शुभ्र आत्म मेह।
ध्वस्त अज्ञान हो तिमिर पाश हर।
आ गया वसन्त मेरे द्वार पर।

प्रणय निरभ्र सुखद वर
प्राण चित्त मन सब अभय कर
उन्मुक्त हों मोह बंध
अज्ञान के तिमिर अंध
निष्काम काम हो निर्बंध
द्वन्दवग्रस्त मनुज अब
ज्योतित आत्म वरण करे-
सर्वांग सत् आनन्द वर।
आ गया वसंत द्वार पर।......अरविन्द

ध्यान में

ध्यान में जब उतरता हूँ--
भूल मैं के मैं को
होने की सीमित सीमा को

फैल जाता है
हृदयाकाश उन्नत
विविधवर्णी प्रभा के
आलोक रंग छिटकता आकाश।

 
पिघलता अहंकार तब।

 
देह का सब भान
लय जो जाता कि जैसे
जल मिले जल में।

 
उछलता कूदता यह मन
जा टिकता त्रिकुटी के भुवन में।

 
शुभ्र आभाजल किरण के
उतरने लगते
अंतस के गगन में।
नाचती वे मूर्तियां
पाषाणवत थिर रहीं जो भुवन में।

 
लघु आकाश में है सिमटता
वृहदाकाश
मोती ज्यों सीप के तन में।

ध्यान में
मैँ नहीं होता
वहां विराट होता है।

ब्रह्माण्ड के किनके
थिरकते क्षीण काय से।

भीतर वहां बस
बृहत् महादाकाश होता है।

लाल,पीली और नीली
नीलिमा में झलकता
सोहं का अवकाश होता है ।.....अरविन्द

शनिवार, 17 जनवरी 2015

इंकार !

इंकार भी ऐसा कि दिल खुश हो जाए
हमने तुम्हें चाहा ही कब था कि कहा जाए। .......... अरविन्द

भरी भीड़ में

भरी भीड़ में अकेले होने का दर्द यही है
दिन बिताये नहीं बीतते साल बीत जाते हैं.। ……अरविन्द

इश्क़ जुल्म करता है !

इश्क़ जुल्म करता है , जान गया हूँ
सारी रात नींद दूर खड़ी नाचती रही ।
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मोर के पंखों का चुन, बाँध लाया हूँ
जिन्हें उतारना हो भूत आ जाए यहां।
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कभी तो रुक कर सहजता से कहो
भागते शब्दों को लोग थाम लेते हैं।
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आओ न माथे पर टांक दूँ इक खिला गुलाब
अक्सर तुम अब बेंदी लगाना भूल जाती हो।
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क्यों न प्रभु को पकड़ हम दिल में उतार लें
दुनिया ने तो प्रभु की सूरत ही बिगाड़ दी है । ………अरविन्द

कहो कैसे हो यार !

कहो कैसे हो यार !
दिनों बाद मिले हो ऐसे कि जैसे
निकला हो इन्द्रधनुष
वर्षों बाद।
कहो कैसे हो यार !!

कहाँ रहे इतने दिन
दिखे नहीं न सुबह , न रात
न भिन्सारे , न खिले दिन ।
ढूंढता रहा ऐसे कि जैसे
कोई अँधा ढूंढता हो अपनी लाठी को
अपना सहारा प्रति पल , प्रति क्षण।

मित्र , अपरिचय केवल देह का होता है
मन और आत्म को तो
विचार कर देता है
चिरकालिक एक और अभिन्न।
फिर भी दर्शन नहीं दिए
कहाँ रहे इतने दिन ?

बहुत कुछ बदल गया--

समाज का आचरण।
अपनों का निवेदन।
बहस के मुद्दे।
अध्यात्म के प्रभु।
राजनीति के धुरंधर।
बच्चों की किलकारियाँ।
पत्नी की फटकार , मनुहार।
मौसम का व्यवहार।
प्रियतमा की पुकार।
चाँदनी का आचार ।
वंदना के गीत।
प्यारे से मीत।
घृणा के बिंदु ।
बिना बात बिगड़े बंधु।
बहुत कुछ बदल गया।

सब कहने के लिए
मैं तड़पता गया।
कहाँ चले गए थे तुम
तुम जैसा कोई अन्य न मिला।
कहो कैसे हो यार !
बहुत दिनों बाद मिले हो --
अब टूटेगा बांध , दुर्निवार। ………… अरविन्द

आजा बेहड़े विच बैह जा हुन !

आजा बेहड़े विच बैह जा हुन
लोहड़ी दी अग्ग नु बाल्लिये नी।
पौह दियां ठंडियां यादां नूँ
बलदी अग्ग विच जाल्लिये नी।

इस दी लाटां उच्चियाँ ने
यादां लोहड़ी दी सुच्चियाँ ने
ओ ढोल ढमक्का चेते ऐ
यद योवन रुते आपां ने
लोहड़ी दी नेहरी रातां विच
वुक्क्ल थल्ले अग्ग बाली सी .।

भंगड़े दी बोलियाँ दे उत्ते
गिद्दे दे टप्पेयाँ दे उत्ते
बेहड़े दी मिट्टी उछाली सी।

चाचे , ताये ,चाचियाँ ने
ताईयां , भाबियां सुच्चियाँ ने
ओ लोहड़ी दी लपटाँ हेठां फिर
मच्चदी लाटां बांगु
था थइया खूब मचाई सी।

आ , हुन फिर आपां
ओह यादां चेते कर लाइये
लोहड़ी दा सगण बी कर लाइये।

एह समय बड़ा निकडमा ए
घर खेरू खेरू कर दित्ता
सब अड्डो अड्डी जा बैठे
बेहड़े नुं कंदा भर दित्ता।

चल छड्ड बीतियाँ गल्लां नूं
आपां तां सगण मना लइये
लोहड़ी दी जगदियां लाटां बिच
कुझ सुत्तियाँ कलां जगा लइये । ............. अरविन्द