जमाना ही ऐसा आ गया है मेरे यारा
जहाँ दिल लगाते हैं वहां दिल नहीं होता। ……… अरविन्द सोमवार, 21 जुलाई 2014
कविता में गधे
कविता में गधे
और गधों की कविता केवल जीवन के ,
गीद्ध --सा
झांकती है। खुदा खुद हैरान है
सच्च से आँख मिलाना कुछ मुश्किल तो है
दिलासे न होते ,तो और भी मुश्किल होती।-------
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शनिवार, 12 जुलाई 2014
गीता की सुनो ---
प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु |
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् || २९ ||
प्रकृतेः – प्रकृति के; गुण – गुणों से; सम्मूढाः – भौतिक पहचान से बेवकूफ बने हुए; सज्जन्ते – लग जाते हैं; गुण-कर्मसु – भौतिक कर्मों में; तान् – उन; अकृत्स्नविदः – अल्पज्ञानी पुरुष; मन्दान् – आत्म-साक्षात्कार समझने में आलसियों को;कृत्स्न-वित् – ज्ञानी; विचालयेत् – विचलित करने का प्रयत्न करना चाहिए |
भावार्थ
माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें आसक्त हो जाते हैं | यद्यपि उनके ये कार्य उनमें ज्ञान के अभाव के कारण अधम होते हैं, किन्तु ज्ञानी को चाहिए कि उन्हें विचलित न करे |
तात्पर्य
अज्ञानी पुरुष स्थूल भौतिक चेतना से और भौतिक उपाधियों से पूर्ण रहते हैं | यह शरीर प्रकृति की देन है और जो व्यक्ति शारीरिक चेतना में अत्यधिक आसक्त होता है वह मन्द अर्थात् आलसी कहा जाता है | अज्ञानी मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानते हैं, वे अन्यों के साथ शारीरिक सम्बन्ध को बन्धुत्व मानते हैं, जिस देश में यह शरीर प्राप्त हुआ है उसे वे पूज्य मानते हैं और वे धार्मिक अनुष्ठानों की औपचारिकताओं को ही अपना लक्ष्य मानते हैं | ऐसे भौतिकताग्रस्त अपाधिकारी पुरुषों के कुछ प्रकार के कार्यों में सामाजिक सेवा, राष्ट्रीयता तथा परोपकार हैं | ऐसी उपाधियों के चक्कर में वे सदैव भौतिक क्षेत्र में व्यस्त रहते हैं, उनके लिए आध्यात्मिक बोध मिथ्या है, अतः वे इसमें रूचि नहीं लेते | किन्तु जो लोग आध्यात्मिक जीवन में जागरूक हैं, उन्हें चाहिए कि इस तरह भौतिकता में मग्न व्यक्तियों को विचलित न करें | अच्छा तो यही होगा कि वे शान्तभाव से अपने आध्यात्मिक कार्यों को करें | ऐसे मोहग्रस्त व्यक्ति अहिंसा जैसे जीवन के मूलभूत नैतिक सिद्धान्त तथा इसी प्रकार के परोपकारी कार्यों में लगे हो सकते हैं |
निहितार्थ ---
प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्मों में क्रमशः गुणों की ओर देख कर उनमें आसक्त होते हैं। उन अच्छी प्रकार न समझने वाले ---मन्दान् ---को हतोत्साहित न करें। अपनी शक्ति और स्थिति का आकलन करके कर्म में प्रवृत होने वाले ज्ञान मार्गी साधकों को चाहिए कि कर्म को गुणों की देन मानें , अपने को कर्ता मान कर अहंकारी न बनें। निर्मल गुणों के प्राप्त होने पर भी उनमें आसक्त न हों। किन्तु निष्काम कर्मयोगी को कर्म और गुणों में समय देने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो समर्पित भाव से कर्म करते जाना चाहिए। कौन गुण आ रहा है या जा रहा है --- यह देखना इष्ट की जिम्मेदारी हो जाती है। ज्ञानयोगी, गुणों का परिवर्तन और क्रम क्रम से उत्थान -पतन इष्ट की ही देन है --यह मानता है। इसे अनन्यता भी कहते हैं। इसी कारण कर्ता का अहंकार या गुणों में आसक्ति होने की समस्या से बचा जा सकता है।
संकेत --
मन्दान् --वे आसक्ति के अंतर्गत बद्ध जीव जो केवल स्व स्व वृति से विमोहित हैं और गुणों को ही सत्य समझते हैं ,उन लोगों के प्रति ज्ञानी को प्रतिक्रिया से रहित होना चाहिए क्योंकि स्वभाव प्रकृति प्रदत्त है। परिवर्तित नहीं हो सकता।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् || २९ ||
प्रकृतेः – प्रकृति के; गुण – गुणों से; सम्मूढाः – भौतिक पहचान से बेवकूफ बने हुए; सज्जन्ते – लग जाते हैं; गुण-कर्मसु – भौतिक कर्मों में; तान् – उन; अकृत्स्नविदः – अल्पज्ञानी पुरुष; मन्दान् – आत्म-साक्षात्कार समझने में आलसियों को;कृत्स्न-वित् – ज्ञानी; विचालयेत् – विचलित करने का प्रयत्न करना चाहिए |
भावार्थ
माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें आसक्त हो जाते हैं | यद्यपि उनके ये कार्य उनमें ज्ञान के अभाव के कारण अधम होते हैं, किन्तु ज्ञानी को चाहिए कि उन्हें विचलित न करे |
तात्पर्य
अज्ञानी पुरुष स्थूल भौतिक चेतना से और भौतिक उपाधियों से पूर्ण रहते हैं | यह शरीर प्रकृति की देन है और जो व्यक्ति शारीरिक चेतना में अत्यधिक आसक्त होता है वह मन्द अर्थात् आलसी कहा जाता है | अज्ञानी मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानते हैं, वे अन्यों के साथ शारीरिक सम्बन्ध को बन्धुत्व मानते हैं, जिस देश में यह शरीर प्राप्त हुआ है उसे वे पूज्य मानते हैं और वे धार्मिक अनुष्ठानों की औपचारिकताओं को ही अपना लक्ष्य मानते हैं | ऐसे भौतिकताग्रस्त अपाधिकारी पुरुषों के कुछ प्रकार के कार्यों में सामाजिक सेवा, राष्ट्रीयता तथा परोपकार हैं | ऐसी उपाधियों के चक्कर में वे सदैव भौतिक क्षेत्र में व्यस्त रहते हैं, उनके लिए आध्यात्मिक बोध मिथ्या है, अतः वे इसमें रूचि नहीं लेते | किन्तु जो लोग आध्यात्मिक जीवन में जागरूक हैं, उन्हें चाहिए कि इस तरह भौतिकता में मग्न व्यक्तियों को विचलित न करें | अच्छा तो यही होगा कि वे शान्तभाव से अपने आध्यात्मिक कार्यों को करें | ऐसे मोहग्रस्त व्यक्ति अहिंसा जैसे जीवन के मूलभूत नैतिक सिद्धान्त तथा इसी प्रकार के परोपकारी कार्यों में लगे हो सकते हैं |
निहितार्थ ---
प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्मों में क्रमशः गुणों की ओर देख कर उनमें आसक्त होते हैं। उन अच्छी प्रकार न समझने वाले ---मन्दान् ---को हतोत्साहित न करें। अपनी शक्ति और स्थिति का आकलन करके कर्म में प्रवृत होने वाले ज्ञान मार्गी साधकों को चाहिए कि कर्म को गुणों की देन मानें , अपने को कर्ता मान कर अहंकारी न बनें। निर्मल गुणों के प्राप्त होने पर भी उनमें आसक्त न हों। किन्तु निष्काम कर्मयोगी को कर्म और गुणों में समय देने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो समर्पित भाव से कर्म करते जाना चाहिए। कौन गुण आ रहा है या जा रहा है --- यह देखना इष्ट की जिम्मेदारी हो जाती है। ज्ञानयोगी, गुणों का परिवर्तन और क्रम क्रम से उत्थान -पतन इष्ट की ही देन है --यह मानता है। इसे अनन्यता भी कहते हैं। इसी कारण कर्ता का अहंकार या गुणों में आसक्ति होने की समस्या से बचा जा सकता है।
संकेत --
मन्दान् --वे आसक्ति के अंतर्गत बद्ध जीव जो केवल स्व स्व वृति से विमोहित हैं और गुणों को ही सत्य समझते हैं ,उन लोगों के प्रति ज्ञानी को प्रतिक्रिया से रहित होना चाहिए क्योंकि स्वभाव प्रकृति प्रदत्त है। परिवर्तित नहीं हो सकता।
शुक्रवार, 11 जुलाई 2014
गुरु पूर्णिमा
आज गुरु पूर्णिमा है। इसलिए गुरु तत्व पर विचार
करना अपेक्षित है। आजकल शिक्षित तथा अर्धशिक्षित समाज में अधिकांश लोग गुरु
के प्रति कोई विशेष आदर नहीं रखते बल्कि गुरु तत्व पर ही प्रश्न करते हैं
कि गुरु की आवश्यकता है या नहीं ? इनमें अधिकांश लोगों का विचार है कि
मनुष्य को जीवन के पथ पर स्वावलम्बी होकर चलना चाहिए ,उसे शक्ति अथवा भाव
के विकास के लिए किसी दूसरे पर आश्रित नहीं होना चाहिए। आध्यात्मिक पथ पर
भी मनुष्य का सम्बन्ध साक्षात परमात्मा के साथ है ,जिसके लिए भक्ति मार्ग
है। इन दोनों के बीच गुरु नामक किसी व्यक्ति के लिए स्थान कहाँ ? इस प्रकार
के चिंतन में गुरु की सत्ता के प्रति संदेह और अनास्था का स्वर सुनाई देता
है। अध्यात्म क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता है अथवा नहीं , इस विषय पर
विचार करने से पूर्व साधारणत: हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जीवन में
पहले -पहल ऐसी एक अवस्था विद्यमान रहती है , जब जीव को शक्ति ,ज्ञान ,भाव
आदि सभी विषयों में परमुखापेक्षी रहने को बाध्य होना पड़ता है। ऐसा ही
प्रकृति का नियम है। तदनन्तर , भीतरी शक्ति और बुद्धि वृति के विकास के साथ
बाहरी सहायता इतनी अपेक्षित नहीं रहती। बाहरी सहायता की अपेक्षा न रहने
पर भी भीतर किसी अचिन्त्य शक्ति की अधीनता तब भी उसे रहती है। उसके बाद
जीवन -पथ पर पूर्ण और चरम स्थिति प्राप्त होने पर स्वाधीनता का विकास होता
है एवं अन्य किसी की भी अपेक्षा नहीं रहती। स्वभाव होने से ही जो होने वाला
होता है ,वह निरपेक्ष रूप से हो जाता है।
साधारणतः आरम्भिक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को निर्देशक
की आवश्यकता रहती है। दूसरी तरफ आध्यात्मिक जीवन अत्यंत गहन , दुर्गम है।
इसलिए इस पथ पर बाहरी सहायता के बिना चलना ,विकास को अर्जित करना , साध्य
को उपलब्ध होना सम्भव नहीं है क्योंकि अध्यात्म व्यक्ति विकास की
चरमोपलब्धि है। इसी बाहरी सहायता को प्राप्त करने के लिए गुरु आवश्यक है।
यह भी जानना चाहिए कि सभी अध्यात्म -पथ के पथिक नहीं हो सकते। क्योंकि जीवन
की भौतिक सुख सुविधाओं को प्राप्त करना ही ऐसे लोगों के लिए महत्वपूर्ण
है। परन्तु वे ,जो परम तत्व के अभिलाषी हैं ,अध्यात्म पथिक हैं ,उन्हें
गुरु की सहायता अवश्य चाहिए। इस विषय में विशद् आलोचना से पूर्व गुरु तत्व
क्या है ,गुरु का वास्तविक कार्य क्या है ,गुरु कितने प्रकार के होते हैं
,गुरु के साथ शिष्य का तथा शिष्य के साथ गुरु का वास्तविक सम्बन्ध क्या है
,गुरु -शिष्य भाव की चरम परिणति कहाँ होती है ? इत्यादि विषयों की
आवश्यकतानुसार आलोचना भी जरुरी है। हमारी मासूमियत
शिकस्तें भी हमारी मासूमियत ही हैं
संभाल ली हैं किताबों में फूलों की तरह।
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डगमगाते कदमों ने ही चलना सिखाया है
लड़खड़ाना आज हमने आदत बना ली है ।
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पूजते रहे जिन्हें हम भगवानों की तरह
पत्थरों ने भी कभी क्या स्वभाव बदला है?……… अरविन्द
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